मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

वनों का अब गैर वनभूमि में विस्तार जरूरी - श्री पी.सी. दुबे इंदौर, उज्जैन और खण्डवा क्षेत्र में बाँस उत्पादन की व्यापक संभावनाएँ

 
 


 

 


   

   

  इन्दौर- गत दिवस जिला मुख्यालय पर नवरतन बाग स्थित वन विभाग के सभागृह में वन क्षेत्र के बाहर वनाच्छादन बढ़ाने हेतु कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में इंदौर, उज्जैन और खण्डवा वन क्षेत्र के क्षेत्रीय वनाधिकारियों, किसानों, कृषि और उद्यानिकी विभागों के अधिकारियों, स्वयंसेवी संगठनों, टिम्बर एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यशाला में निर्णय लिया गया कि वन भूमि के बाहर पड़त भूमि, निजी भूमि और शासकीय भूमि पर भी वनाच्छादन जरूरी है। कार्यशाला में पेड़ कटाई नियम, सरलीकरण, पर्यावरण, नदियों के सतत प्रवाह और कृषि वानिकी पर चर्चा की गई। इस अवसर पर अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक भोपाल डॉ. पी.सी. दुबे ने कहा कि प्रदेश में पर्यावरण सुधार के लिये वन विस्तार जरूरी है। राष्ट्रीय वन नीति-1988 और राज्य वन नीति-2005 के मापदण्डों के लिये प्रदेश में 33 प्रतिशत वन क्षेत्र जरूरी है। मध्यप्रदेश में कुल जनसंख्या लगभग साढे सात करोड़ है। 33 प्रतिशत वन क्षेत्र लक्ष्य हासिल करने के लिये प्रदेश में कुल 400 करोड़ पौधे रोपित करना जरूरी है।
          श्री दुबे ने इस अवसर पर यह भी कहा कि इंदौर वन वृत्त की जनसंख्या 72.16 लाख है। इस क्षेत्र में भी वनाच्छादन के 33 प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त करने के लिये 42 करोड़ पौधे लगाना जरूरी है। इसी प्रकार खण्डवा वन वृत्त की कुल जनसंख्या 53 लाख 26 हजार है। इस क्षेत्र में भी 38 करोड़ पौधे रोपित करने की आवश्यकता है। उज्जैन वन वृत्त की कुल जनसंख्या 86 लाख 84 हजार है। पर्यावरण सुधार के लिये इस क्षेत्र में भी 102 करोड़ पौधे लगाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में मेड़ों पर भी वृक्षारोपण किया जा सकता है। किसान सागौन और साजा प्रजाति जैसी अधिक मूल्य देने वाली प्रजातियों को लगाने हेतु प्रयास कर सकते हैं।
          श्री दुबे ने कहा कि इंदौर संभाग के आदिवासी बहुल जिले अलीराजपुर में बाँस के रोपण की व्यापक संभावनाएँ हैं। वहाँ की जलवायु बाँस के लिये उपयुक्त है। किसान बाँस का व्यावसायिक उत्पादन कर अपनी आय में सुधार ला सकते हैं। अलीराजपुर जिले में 7.68 वर्ग किमी वन भूमि में बाँस लगाये गये हैं। सोंडवा और भाबरा (सीएस नगर) तहसील की मिट्टी बाँस उत्पादन के लिये उपयुक्त है। अलीराजपुर जिले की जलवायु, मृदा, वर्षा आदि बाँस के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है। कृषि के लिये अनुपयुक्त भूमि में भी बाँस को सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। अलीराजपुर जिले की निजी भूमि पर प्रचुर मात्रा में बाँस का रोपण किया जा सकता है। राज्य शासन की मंशा है कि प्रदेश का हर किसान अपने मेड़ों पर बाँस, साजा और सागौन के पौधे लगायें।
          कार्यशाला को मुख्य वन संरक्षक वन वृत्त इंदौर श्री सी.एस. निनामा, आयुक्त उद्यानिकी डॉ. एम. कालीदुरई, प्रो. एम.एम. पटेल, श्री सतीश अग्रवाल, कृषि वैज्ञानिक श्री बी.पी.एस. बुंदेला, श्री जी.एस. मिश्रा, श्री जमनालाल पाटीदार, श्री अरूण पारीख और श्री प्रेम पटेल आदि ने सम्बोधित किया।
    कार्यशाला में सभी इस बात पर सहमत पर थे कि समाजिक वानिकी के विकास के लिये गंभीर प्रयास जरूरी हैं। वनों के विकास के लिये कृषिवानिकी को बढ़ावा देना जरूरी है। मध्यप्रदेश भू राजस्व संहिता-1959 में संशोधन कर लोक वानिकी के तहत जनता द्वारा अपनी निजी भूमि पर वृक्षारोपण के लिये प्रेरित किया जाये। वन विकास के लिये उन्नत नस्ल के पौधे, पर्यावरण के अनूकूल प्रजातियाँ, किसान काल सेन्टर की भी जरूरत है। कार्यशाला में स्वयंसेवी संगठन, किसान मिल मालिक, काष्ठ कला विशेषज्ञ, कृषि, उद्यानिकी और वन विभाग का स्टाफ मौजूद थे।




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