गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

एक दिन के अंतराल में अन्न ग्रहण कर वर्षो से उपवास एवं एकासन तप कर रही श्राविकाऐं   2 वर्षो में एक उपवास वर्षीतप होता है पूरा


खिरकिया। जैन समाज तप, त्याग, संयम का पाठ सिखाता है, यही नही कठिन तपस्याओ के माध्यम से यह पूरा होता है। जिनमे से एक वर्षीतप भी होता है। वर्षीतप वर्ष भर से अधिक समय तक चलने वाली कठिन तपस्या होती है। जैन श्वेताम्बर समाज खिरकिया की 5 एवं चारूवा की 2 श्राविकाओ द्वारा वर्षीतप किए जा रहे है। जिनके तपो के वर्ष पूर्ण होने पर अक्षय तृतीय के अवसर पर पारणा होगा। जिसमें एकासन एवं उपवास के माध्यम से यह तप किए जा रहे है। नगर से एकासन तप करने वाली श्राविका विमला रांका के आठ वर्ष, विजया रांका का तीसरा वर्ष पूर्ण,  मीनू मेहता का दूसरा वर्ष, उर्मिला नाहर चारूवा का पहला वर्ष पूर्ण होगा। इसी तरह उपवास के माध्यम से वर्षीतप करने वाली उर्मिला नागड़ा के दूसरे वर्षीतप का अंतिम वर्ष, सुषमा नाहर चारूवा उपवास से दूसरे वर्षीतप का पहला वर्ष पूर्ण, राजश्री मेहता का प्रथम वर्षीतप का अंतिम वर्ष पूर्ण होगा। 26 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर तप का वर्ष पूर्ण होने पर पारणा होगा।
क्या है वर्षीतप, क्यो है कठिन  
इस तप का आरम्भ फाल्गुन कृष्णा अष्टमी से होता है। जिसमें 400 दिनों तक अर्थात 13 महीने और 11 दिवस एकांतर उपवास किया जाता है। इस तप के दरमियाँ एक साथ 2 दिन भोजन ग्रहण नही किया जाता है। एक दिन यानि पहले दिन केवल जल पर आधारित उपवास किया जाता है, फिर दूसरे दिन अन्न ग्रहण किया जाता है, वह भी दो बार ही किया जाता है। प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव परमात्मा को दीक्षा अंगीकार करने के बाद लाभांतराय कर्म का उदय होने से 400 दिन तक उन्हें निर्दोष भिक्षा की प्राप्ति नहीं हुई थी। इस कारण उन्होंने दीक्षा दिन से 400 निर्जल उपवास किये थे। ऋषभदेव के तप की स्मृति में यह वर्षीतप किया जाता है। इसे संवत्सर तप भी कहा जाता है। वर्षीतप की अवधि उपवास वालो के लिए 2 वर्ष एवं एकासन तप के लिए चार वर्ष में पूर्ण होता है।

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